भारतीय खाद्य निगम के बोर्ड के गठन में नियमों का पालन न करने पर संसदीय समिति ने जताई नाराजगी

नई दिल्ली, 5 फरवरी | भारतीय खाद्य निगम बोर्ड के गठन में नियमों का पालन नहीं करने को लेकर उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के रवैये पर संसदीय समिति ने गहरी नाराजगी व्यक्त की है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा सांसद संतोष गंगवार की अध्यक्षता वाली संसद के सार्वजनिक उपक्रमों की समिति ने भी भारतीय खाद्य निगम पर लोकसभा में पेश रिपोर्ट में मंत्रालय के जवाब पर नाराजगी व्यक्त की है.

समिति के अनुसार, भारतीय खाद्य निगम अधिनियम की धारा 7 (1) में तीन अलग-अलग मंत्रालयों – खाद्य, वित्त और सहकारिता के अनिवार्य प्रतिनिधित्व का प्रावधान है, लेकिन निगम के बोर्ड के गठन में एक ही मंत्रालय के दो अधिकारी शामिल थे। अर्थात प्रशासनिक मंत्रालय और इसमें वित्त मंत्रालय से कोई नहीं था।

संसदीय समिति ने भी इस संबंध में मंत्रालय द्वारा दिए गए जवाब पर नाराजगी जताते हुए इसे नियमों का उल्लंघन बताया।

दरअसल, समिति द्वारा उठाए गए सवाल के जवाब में मंत्रालय ने कहा था कि एएस एंड एफए को भारतीय खाद्य निगम के बीओडी में वित्त मंत्रालय के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया गया है। समिति ने मंत्रालय के तर्क को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के एएस एंड एफए के एक मंत्रालय में पूर्णकालिक नौकरी के कारण, उन्हें दूसरे मंत्रालय के अधिकारी के रूप में नहीं माना जा सकता है।

समिति ने मंत्रालय द्वारा दिए गए उत्तर की निंदा की और मंत्रालय से निगम में बोर्ड स्तर पर नियुक्तियों के महत्व को कम करके आंकने और काल्पनिक और अनुचित तर्कों द्वारा इसके औचित्य पर आत्मनिरीक्षण करने को कहा।

संसदीय समिति ने सरकार के जवाब को खारिज करते हुए सिफारिश की कि मंत्रालय खाद्य निगम अधिनियम, 1964 का अनुपालन करते हुए भारतीय खाद्य निगम के बोर्ड में तीन मंत्रालयों के प्रतिनिधित्व को सही करने के लिए तत्काल कदम उठाए। समिति ने यह भी कहा है कि सिफारिश पर की गई कार्रवाई से 3 माह के भीतर अवगत कराने को कहा।

समिति ने भारतीय खाद्य निगम के निदेशक मंडल के नियमों के अनुसार पुनर्गठन की भी सिफारिश की है।